प्राचीनता एवं नवीनता के सेतु प्रखर राष्ट्रवादी पं. दीनदयाल उपाध्याय
डाॅ. सुभाष चन्द्राकर1, डाॅ. मनीषा शर्मा2, श्रीमती मनीषा दुबे3
1सहायक प्राध्यापक, दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर
2प्राध्यापक, शास. डाॅ. राधाबाई नवीन कन्या महाविद्यालय, रायपुर
3शोध छात्रा, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़
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पं. दीनदयाल उपाध्याय भारत के ऐसे मनीषी है, जिनका बचपन विकट स्थितियों में बीता, फिर भी उन्होंने मेधावी छात्र के रूप में अपनी पहचान बनायी। उच्च शिक्षा अध्ययन के समय कानपुर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में 1937 में आये व उसी के होकर रह गये।
पं. दीनदयाल उपाध्याय, प्रखर राष्ट्रवादी
प्रस्तावनाः-
पं. दीनदयाल उपाध्याय भारत के ऐसे मनीषी है, जिनका बचपन विकट स्थितियों में बीता, फिर भी उन्होंने मेधावी छात्र के रूप में अपनी पहचान बनायी। उच्च शिक्षा अध्ययन के समय कानपुर में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में 1937 में आये व उसी के होकर रह गये। संघ के प्रचारकों का जीवन बौद्ध भिक्क्षुओं या सन्यासियों की तरह परिव्राजक का जीवन होता है।
साधारण पहनावा कोई निजी व्यवसाय नहीं, संघ का कार्य ही जीवन का उद्देश्य बन जाता है। दीनदयाल जी अध्ययन शील थे। 1942 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने व 1951 में जनसंघ की स्थापना के साथ ही उनका सार्वजनिक जीवन शुरू हो जाता है।
1951 से 1967 तक वे भारतीय जनसंघ के महामंत्री रहे व 1968 में उन्हें जनसंघ के अध्यक्ष का दायित्व मिला व मात्र 4 माह बाद उनकी हत्या कर दी गयी। मात्र 52 वर्ष की आयु में उन्होंने इतना कुछ लिख छोड़ा है, जो आने वाले समय में भारत का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा, उन्होंने पश्चिम के राजनीतिक दर्शन व प्राचीन भारतीय दर्शन का मेल कराकर एक नई दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत की है जिसका अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता हैः-
एकात्म मानववादः
एकात्म मानववाद दीनदयाल उपाध्याय जी की एक महत्वपूर्ण देन है इसके बीज भारतीय परम्परा, वेद उपनिशद एवं गीता में देखा जा सकता है प्राचीन भारतीय साहित्य वेद जिसमें ऋगवेद सबसे प्रमुख एवं मौलिक माना जाता है मंत्र (5.3.1) में एकेश्वरवाद का उदाहरण मिलता है, जिसमें वैदिक ऋषि अग्णि को संबोधित करते हुए प्रार्थना करता है- सायंकाल के समय अग्नि वरूण है, प्रातः काल उदित होते समय वे मित्र है सविता बनकर वायु में भ्रमण करते हैं और इन्द्र के रूप में वे आकाश में चमकते हैं। इस प्रकार वेदों में बहुदेववाद से एकाधिदेववाद होते हुए एकेश्वरवाद का विकास हुआ। ऋगवेद के नासदीय सूक्त में कहा गया है- ‘उस समय न सत था और न असत, पृथ्वी भी नहीं थी, आकाश भी नहीं था तथा न उससे ऊपर व्योम, आवरण भी कहां था?.... उस समय मृत्यु भी नहीं थी, अमरता भी नहीं थी। रात और दिन का भेद नहीं था। वायु, शून्य और श्वास-प्रश्वासयुक्त केवल ब्रम्हा ही था। उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था। सृष्टि की रचना में अंधकार से अंधकार ढका था।..... किसने सृष्टि की रचना की और किसने नहीं यह सब वह ही जाने जो इसका स्वामी परमधाम में रहता है। हो सकता है वह भी ये सब नहीं जानता हो, उपरोक्त सूक्त विश्व साहित्य की अनुपम निधि है, जिसमें सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति एक मूल कारण से बताई गई है, इसी सूक्त में हमें एकात्मवादी विचारधारा का सार दिखाई देता है। जिसे स्पष्ट करने का श्रेय दीनदयाल जी को जाता है।
एकात्म मानववाद एक विचारधारा है, जिसे दीनदयाल जी ने दुनिया के सामने स्पष्ट किया उनका कहना था कि प्रत्येक देश की अपनी ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियाँ होती है, देश के नेता उन परिस्थितियों के प्रकाश में ही अपने देश को आगे बढ़ाने का कार्य करते है, व समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते हैं। जैसे विश्व भर के मनुष्य के शरीर में अंगों की संरचना एक समान होती है, परन्तु जो औषधि इंग्लैण्ड में रहने वाले के लिए कारगार होगी, वह भारत में भी कारगार होगी यह कहना निर्विवाद नहीं है। यही बात विभिन्न राष्ट्रों की समस्याओं के समाधान में भी लागू है, पश्चिम की संस्कृति अलग है, भारत की संस्कृति अलग है, भारत की संस्कृति की विशेषता है, कि वह सम्पूर्ण जीवन का, सम्पूर्ण श्रृष्टि का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। जीवन में विविधता है, परन्तु उसके मूल में एकता है, जरूरत उस एकता को खोज निकालने की है। हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र मानव होना चाहिए, भौतिक उपकरण मानव सुख के साधन है, साध्य नहीं। एकात्म मानववाद के आधार पर हमे जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा।
अंत्योदय:
दीनदयाल जी का कहना था- आर्थिक योजनाओं तथा प्रगति का माप समाज के ऊपर की सीढ़ी पर पहुँचे व्यक्ति से नहीं अपितु सबसे नीचे के स्तर के व्यक्ति से होना चाहिए, आज देश में करोड़ों लोग हैं, जो मानव के किसी अधिकार का उपभोग नहीं कर पाते, शासन की योजनाएँ इन्हें अपनी परिधि में लेकर नहीं चलती, बल्कि उन्हें मार्ग का रोड़ा मानती है, इन मैले कुचैले, अनपढ़ मूर्ख लोग हमारे नारायण है हमें इनकी पूजा करनी चाहिए। यह हमारा सामाजिक एवं मानव धर्म है कि हम इनको पक्का, सुन्दर, स्वच्छ घर बनाकर देंगे, जिस दिन हम इनके बच्चों और स्त्रियों को शिक्षा देकर इनकी आय को ऊँचा उठा देंगे उस दिन हमारा भ्रातृभाव व्यक्त होगा। गाँवों में समय अचल खड़ा है, जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को बनाने में असमर्थ हैं, वहाँ आशा और पुरूषार्थ का संदेश पहुँचाने की आवश्यकता है।
राष्ट्र की अवधारणा:
हमारी राष्ट्रीयता का आधार भारत माता है। केवल भारत नहीं, माता शब्द हटा दीजिए तो भारत केवल जमीन का एक टुकड़ा मात्र रह जाएगा। राष्ट्र ही एकमेव सत्य है। इस सत्य की उपासना करना सांस्कृतिक कार्य है। राजनीति कार्य तभी सफल हो सकते हैं, जब प्रखर राष्ट्रवाद से युक्त सांस्कृतिक कार्य की शक्ति विद्यमान हो।
लोकतंत्रः
लोकाधिकार की प्रतिष्ठा और लोक कर्तव्य के निर्वाह का लोकतंत्र एक साधन है, केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में भी लोकतंत्र चाहिए, वास्तव में जनतंत्र अविभाज्य है किसी एक क्षेत्र में लोकतंत्र का अभाव दूसरे क्षेत्र में लोकतंत्र को नहीं पनपने देगा।
निष्कर्षः
पं. दीनदयाल उपाध्याय युग पुरूष थे, उन्होंने भारतीयता परक विचारों का युगपरक विवेचन किया। आज का अकादमिक जगत भारतीय संस्कृति को राजनीति, अर्थशास्त्र व समाजशास्त्र का जीवंत हिस्सा नहीं मानता, अकादमिक जगत पाश्चात्य उद्धरण को लेना ही श्रेष्ठता मानता है, दीनदयाल जी इसे अपमानजनक मानते हैं। उनका प्रयास पाश्चात्य बहस का अनुयायी न बनकर बहस को भारतीयता के साथ आगे बढ़ाने का था। दीनदयाल जी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे, वे एक कुशल राजनीतिज्ञ, संगठन कत्र्ता, प्रखर पत्रकार, मूर्धन्य साहित्यकार थे, वे देश की एकता व अखण्डता की रक्षा के प्रति पूरी तरह समर्पित थे, उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण समाज सेवा में लगाया, उनका पूरा जीवन शोध का विषय है।
संदर्भ ग्रन्थ सूचीः
1. श्री अरविन्द - मानव एकता का आदर्श, युद्ध और आत्म निर्णय, श्री अरविन्द साहित्य खण्ड 5 पाण्डिचेरी अरविन्द सोसायटी (1969)
2. श्री अरविन्द - दिव्य जीवन, पाण्डिचेरी, श्री अरविन्द आश्रम (1999)
3. उपाध्याय दीनदयाल - एकात्म मानवदर्शन एवं उसका व्यवहारिक प्रयोग, नई दिल्ली, दीनदयाल शोध संस्थान (1979)
4. डाॅ. महेशचन्द्र शर्मा - दीनदयाल उपाध्याय कर्तव्य एवं विचार, नई दिल्ली, वसुधा पब्लिकेशन्स प्रा.लि.
5. डाॅ. महेशचन्द्र शर्मा - दीनदयाल सम्पूर्ण वाड.मय खण्ड 1, प्रभात प्रकाशन (2016)
6. अमरेश अवस्थी - आधुनिक भारतीय एवं राजनीतिक चिन्तन, नई दिल्ली, रिसर्च पब्लिकेशन्स (1988)
7. डाॅ. राकेश दुबे - एकात्मवादी शिक्षा दर्षन, विद्या भारतीय शिक्षा संस्थान, कुरूक्षेत्र (2014)
Received on 25.06.2018 Modified on 22.07.2018
Accepted on 19.09.2018 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(3):302-304.